बा-इज़्ज़त बरी हमें कहानी का वो हिस्सा सुनाती है जो हमें सुनने नहीं दिया गया

बा-इज़्ज़त बरी हमें कहानी का वो हिस्सा सुनाती है जो हमें सुनने नहीं दिया गया

ज़ैग़म मुर्तज़ा

बा-इज़्ज़त बरी नाम की एक किताब इन दिनों बेहद चर्चा में है। सामाजिक कार्यकर्ता डा. अलीमुल्लाह ख़ान और पत्रकार मनीषा भल्ला की किताब बा-इज़्ज़त बरी मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियों में है। इसे लेकर चर्चाओं की वजह है कि यह किताब उन लोगों की आपबीती है जो आतंकवाद के आरोपों में बरसों जेलों में रहे और फिर सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए।

मज़हबी आतंकवाद और मज़हबी राष्ट्रवाद दो ऐसे भावनात्मक मुद्दे हैं जिनपर निष्पक्ष औऱ सामान्य चर्चा तक़रीबन नामुमकिन मान ली गई है। इन मुद्दों पर एक विभाजन रेखा, ख़ासतौर पर देश की हिन्दी पट्टी में साफ महसूस की जा सकती है। एक वर्ग जो देश की हर समस्या के लिए सामने वाले के मज़हब को ज़िम्मेदार मानता है जबकि दूसरा वर्ग अपनी हर समस्या की वजह मज़हब के नाम पर होने वाले उत्पीड़न और पक्षपात को समझता है।

इसकी एक वजह टू नेशन थ्योरी है जिसके आधार पर 1947 में ब्रिटिश क़ब्ज़े वाले भूभाग की आज़ादी और इससे पहले ज़मीन का धार्मिक आधार पर विभाजन भी है। दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंग्रेज़ों को लगा कि अब साम्राज्य को बचाए रख पाना एक महंगा सौदा है। ब्रिटिश अपने उपनिवेशों के तमाम संसाधन निचोड़ चुके थे और उन्हें यहां बने रहने का कोई औचित्य नज़र नहीं आ रहा था। अंग्रेज़ों ने जाते-जाते भारतीय भूभाग की धार्मिक आधार पर विभाजन की मांग मान ली। अग्रेज़ चले गए और जाते जाते छोड़ गए भारत और पाकिस्तान जहां दो अलग-अलग मज़हब के लोग बहुसंख्यक थे।

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो सबसे बड़ा सवाल था कि देश में अल्पसंख्यकों के हित और अधिकारों का क्या होगा? इस सवाल की दो बड़ी वजहें थीं। एक पाकिस्तान नाम का मुल्क इसी सवाल के इर्द गिर्द बुने गए डर की वजह से वजूद में आया दूसरे आज़ादी का ऐलान होते ही देश के अलग-अलग हिस्सों में साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनकी चपेट में आकर लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत ने अपने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और बराबरी की संवैधानिक गारंटी दी लेकिन आज़ादी के सत्तर साल बाद भी मूल सवाल बाक़ी है, कि अल्पसंख्यकों के हित और अधिकारों का क्या होगा?

बा-इज़्ज़त बरी तक़रीबन अनदेखा कर दिए गए इस सवाल को फिर से चर्चा में लाती है। मेरा सौभाग्य है कि यह किताब प्रकाशन से पहले पाठ्य सुधार और संपादन के लिए मेरे पास आई। इस किताब में कुल सोलह कहानियां हैं। हालांकि इनको कहानी कहना इन दास्तानों के साथ नाइंसाफी होगी। यह उन सोलह लोगों की आपबीती है जिन्होंने आतंकवाद के आरोप में अपनी ज़िंदगी के सुनहरे साल जेल की काल-कोठरियों में गुज़ार दिए। जब उनकी ज़िंदगी कुछ हासिल करने और कुछ बड़ा करने की तरफ उड़ान भरने वाली थी तभी उनके पर काट कर उनको तक़रीबन ठिकाने लगा दिया गया।

मनीषा भल्ला और अलीमुल्लाह ख़ान की यह किताब उन कहानियों का दूसरा पहलू है जिन्हें हम सरकारी एजेंसियों और मीडिया के मुंह से पहले ही सुन चुके हैं। निष्पक्ष पत्रकारिता का तक़ाज़ा है कि कोई रपट या ख़बर एकतरफा न हो लेकिन इन 16 लोगों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। इनको गिरफ्तार करके एजेंसियों ने मीडिया को अपनी ब्रीफिंग दी और मीडिया ने उसको ज्यों का त्यों छाप दिया। किसी ने इतनी भी कोशिश नहीं कि एजेंसियों के दावे को अपने स्तर पर जांच ले।

एक तो मुसलमान ऊपर से आतंकवाद के आरोपी। ऐसे में मामलों में मीडिया का निष्पक्ष रह पाना तक़रीबन नामुमकिन है। हम अकसर साम्प्रदायिक दंगों और मज़हबी एजेंडा वाली ख़बरों में ऐसा देखते हैं। इसमें मीडिया में एक वर्ग के प्रतिनिधित्व का अभाव तो है ही, दूसरे पक्ष के लिए मन में बुन रखी अवधारणाएं भी हैं। इसके अलावा आतंकवाद से जुड़े मामलों में मीडिया पर अतिरिक्त जनदबाव भी होता है। ख़ैर, इस सबका असर होता है कि दूसरे पक्ष को सुना ही नहीं जाता। बा-इज़्ज़त बरी ऐसे ही सोलह मामलों में दूसरा पक्ष है। हालांकि यह दूसरा पक्ष जानने में हमने बहुत देरी कर दी है।

जैसे ही आप यह किताब पढ़ना शुरु करेंगे आपको पहले ही पन्ने से लगने लगेगा कि कहीं कुछ ग़लत होने वाला है। किताब में पात्र ख़ुद बोल रहे हैं और आपको वह सब बता रहे हैं जो आप जानना चाहते हैं लेकिन इतने बरस गुज़र जाने पर भी जान नहीं पाए। जिन सोलह लोगों की दास्तान इस किताब में है वो कोई सड़कछाप शोहदे या उठाइगीरे नहीं हैं। किताब पढ़ने के बाद आपको पता चलता है कई इंजीनियर, डाक्टर, पत्रकार और प्रोफेशनल्स व्यवस्था का शिकार बन गए वरना वह देश की तरक़्क़ी में बड़ा योगदान कर सकते थे। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए। इससे भी बड़े दुख की बात है कि इस बात का किसी को मलाल नहीं है। इसे सही ठहराने वाले आराम से कह सकते हैं कि पाकिस्तान में भी तो ऐसा होता है। हालांकि ऐसा करते वक़्त वह भूल जाते हैं कि पाकिस्तान में हमारे जैसा संविधान या अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी संवैधानिक गारंटी नहीं है।  

बहरहाल, यह किताब सिर्फ दास्ताने नहीं सुनाती है बल्कि उस दूसरे पक्ष की तरफ से सवाल भी पूछती है जिसे आज तक सवाल करने का हक़ हासिल नहीं हुआ है। जिन लोगों ने अपनी जवानी जेलों में गुज़ार दी वह जानना चाहते हैं कि आख़िर उनका दोष था क्या? अगर उन्होंने कोई ग़लत काम नहीं किया तो क्यों उनकी ज़िंदगी जेलों में गुज़र गई? क्या इसके लिए उनकी बुरी क़िस्मत ज़िम्मेदार है, उनका एक विशेष मज़हब से होना या फिर राजनीतिक तंत्र की विभाजन को ज़िंदा रखने की साज़िश? यह सवाल सिर्फ पीड़ितों का नहीं है. बल्कि उनके परिवारों का औऱ इन लोगों का भी है जिनका यक़ीन देश, संविधान और तंत्र में है। आख़िर उनसे 1947 में समानता और सहिष्णुता का एक वादा किया गया था। देश, सत्ता और तंत्र से यह सवाल पूछना उनका संवैधानिक अधिकार है। यक़ीनन बा-इज़्ज़त बरी पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि ज़ुल्म की अभी ऐसी हज़ारों दास्तान और हैं जिनका दूसरा पक्ष हमें ज़रूर जानना चाहिए।

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